इस भ्रम में नहीं रहें कोई भी गुरु जो आपको ज्ञान दे सकता है…!

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तुम उस ज्ञान की तलाश करना जो शब्दों से नहीं मिलता, निःशब्द से मिलता हैं। बता दे जो सोचने विचारने से नहीं मिलता है। निर्विचार होने से मिलता है। तुम उस ज्ञान को खोजना जो शास्त्रों में नहीं है बल्कि स्वयं में है।

वही ज्ञान तुम्हें मुक्त करेगा वही ज्ञान तुम्हें एक नये नर्तन से भर देगा। बता दे वह तुम्हें जीवित करेगा। वह तुम्हें तुम्हारी कब्र के ऊपर ही बाहर उठाएगा। उससे आएंगे फूल जीवन के। और उससे ही अंततः परमात्मा का प्रकाश प्रगट होगा। पंडित यह जानता है और नहीं जानता। लगता यह है कि जानता है। ऐसे ही जैसे की बीमार आदमी बजाय औषधि लेने के, चिकित्साशास्त्र का अध्ययन करने लगे। जैसे भूखा आदमी पाकशास्त्र पढ़ने लगे।

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आपको बता दे कि ऐसे सत्य की अगर भूख हो, तो भूल कर भी धर्मशास्त्र में मत उलझ जाना। वहां सत्य के संबंध में बहुत ही बातें कही गई हैं। लेकिन सत्य नहीं है। क्योंकि सत्य तो कब कहा जा सका है ? कौन हुआ है समर्थ जो उसे कह सके ? इसलिए गुरु ज्ञान नहीं देता है।

वस्तुतः तुम जो भी ज्ञान लेकर आते हो तो उसे ही छीन लेता है। गुरु तुम्हें बनाता नहीं बल्कि मिटाता है। तुम्हारी याद्दाश्त के संग्रह को ही बढ़ाता नहीं, तुम्हारी याद्दाश्त, तुम्हारे संग्रह को खाली ही करता है। जब तुम पूरे खाली हो जाते हो, तो परमात्मा तुम्हें भर देता है। शून्य हो जाना पूर्ण को पाने का मार्ग है।

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