इस पेड को सोना गोल्ड से ज्यादा मानते है यहाँ के लोग, कारण जानकर आप भी चौक जायेंगे…!

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कुछ ऐसी भी चीजे होती है जो परंपरा के नाम से सदियों से चली आती है। ऐसा ही एक पेड़ महुआ आदिवासियों के जीवनयापन का जरिया बन चुका हैं। बता दे कि आदिवासी लोग इस पेड़ को काटने नहीं देते हैं। वे इसे अपनी परंपराओं का हिस्सा मानते हैं।

आपको बता दे कि आदिवासी अपने घर के हर सदस्यों को जंगल ले जाते हैं। छोटे बच्चों को भी पेड़ों के नीचे छोड़ दिया जाता है। उन्हें भी बचपन से ही महुआ को चुनना सिखाया जाता है। बता दे कि महुआ कलेक्ट करने का समय भी तय है। आदिवासी सुबह से ही महुआ एकत्र करने जंगल की ओर निकल जाते हैं। बता दे वे दोपहर तक जंगलों में ही रहते हैं।

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सुबह मवेशियों से महुए को बचाने की जुगत भी किया जाता है। पूरा परिवार दिन भर ही जंगल में रहकर महुआ जमा करते हैं। फिर भी शाम को आदिवासी जंगल से अपने घरों में लौट को आते हैं। जंगल जाने से पहले ही आदिवासी दिन के खाने की तैयारी भी कर लेते हैं परिवार जंगल में ही भोजन भी करता है। बता दे कि महुआ को पेड़ों के पास ही खास तरह से तैयार लकड़ियों के घेरे के बीच में रख कर उसे सुखा भी लिया जाता है।

आपको बता दे कि आदिवासियों के लिए महुए का पेड़ किसी भी कल्पवृक्ष से कम नहीं है। महुए का फूल ही नहीं, इसके फल और बीज भी उपयोगी रहते हैं। बता दे हरेक आदिवासी परिवार मार्च से अप्रैल तक महुए का फूल ही बीनते हैं। जून में इन्हीं गुच्छों में टोरा फल पककर तैयार हो जाता है। जिससे तेल भी निकाला जाता है।

महुआ औषधीय गुणों से भी भरपूर प्रयोग भी होता है। एक पेड़ हर सीजन में औसतन 5000 रु. तक की आमदनी भी देता है। अकेले दक्षिण बस्तर में ही लगभग 3 लाख महुए के पेड़ हैं।

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