दोनों पैर खोने के बाद भी दिखाई ताक़त, बच्चों को पहुंचाया लक्ष्य तक…!

मां खुद लाख परेशानी सहकर भी अपने बच्चों पर दु:ख का साया तक नहीं पडऩे देती है। वह खुद भूखी रह लेगी, किन्तु अपने बच्चों की आवशयकताओ को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ती है। ऐसा ही कुछ शहर की एक स्त्री ने कर दिखाया। स्वयं के दोनों पैर ट्रेन हादसे में खो देने के बाद भी उन्होंने कड़ा संघर्ष पर अपने बच्चों को मंजिल तक पहुंचाया दिया।

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अनिषा देशवाली (41) निवासी भगवानपुरा के दोनों पैर 17 अगस्त 2005 को अजमेर से नीमच आते समय चंदेरिया में ट्रेन से उतरते समय ट्रेन की चपेट में आ गए थे, एक साथ चार डब्बे उनके पैर से गुजर जाने के वजह उनके दोनों पैर बेकार हो गए। जिसके बाद बहुत दिनों तक इलाज चलने के बाद वे ठीक हुई। तो एक ओर दोनों पैर खो देना तो दूसरी ओर सिर पर तीन बच्चों की परवरिश का जिम्मा किसी चेतावनी से कम नहीं था। क्योंकि उस वक़्त उनके दो बेटे एक पांच, एक सात वर्ष का और एक बेटी 9 वर्ष की थी। किन्तु अनिषा ने हार नहीं मानी, उन्होंने अपने बच्चों को पैरों पर खड़ा करने के लिए पार्लर चलाया, इसी के साथ सिलाई करते हुए मेहंदी क्लासेस भी चलाई, ताकि बच्चों का भरण पोषण कर उनका जिंदगी संवार सकें। फिर क्या था, दोनों पैर नहीं होने के बावजूद निरंतर संघर्ष कर उन्होंने बच्चों को पढ़ा लिखाकर एक बेटे और एक बेटी की विवाह कर दी, वहीं एक बेटा निजी क्षेत्र में नौकरी कर रहा है।

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जिस वक़्त दुर्घटना हुई थी उस वक़्त अनिषा की आयु मात्र 28 वर्ष की थी, किन्तु उन्होंने अपनी ताकत को टूटने नहीं दिया और अपने परिवार को साथ लेकर चली।

अनाथ और गरीब बच्चों को नि:शुल्क देती है सेवा
अनिषा गर्मी के दिनों में मेहंदी आदि कोचिंग क्लासेस चलाती है। उन्होंने बताया कि दोनों पैर खोने के बाद उन्हें शासन से कोई सुविधा नहीं मिली, उनका दिव्यांगता का साॢटफिकेट भी अब जाकर बना है। उन्होंने जो संघर्ष का सामना किया है। उसी से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने प्रण लिया है कि वे अनाथ व गरीब बच्चों को फ्री में सेवा देंगी। ताकि उन्हें किसी प्रकार की मुसीबत नहीं हो।

मानसिक रूप से मजबूत होना चाहिए

प्रत्येक स्त्री को सेल्फ डिपेंड होना चाहिए। चाहे वह माता हो या बेटी, व्यक्ति हाथ पैर से दिव्यांग हो तो चलेगा, किन्तु यदि वह मानसिक रूप से मजबूत हो तो निश्चित ही हर मंजिल को पा सकता है। इसलिए प्रत्येक स्त्री को चाहिए कि वह अपने आप को कमजोर न समझे और प्रत्येक कठिनाई का सामना करें, तो निश्चित ही लक्ष्य उनके कदमों में होगी।

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